डर से हाथ-पैर नहीं हिलाना सहमति नहीं : हाईकोर्ट इलाहाबाद

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इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति अब्दुल शाहिद की एकल पीठ ने दुष्कर्म के मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि घटना के दौरान भयभीत पीड़िता के हाथ-पैर नहीं हिलने को उसकी सहमति नहीं माना जा सकता। पीड़िता अकेली विधवा महिला थी। आरोपी की उम्र उससे कम थी। डर के कारण हाथ पैरों का न हिलना डुलना स्वाभाविक हो सकता है। इसे सहमति के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। इस टिप्पणी के साथ ही कोर्ट ने आरोपी मंगल सिंह की आपराधिक अपील को खारिज कर दिया।
‌हाईकोर्ट ने कहा कि यदि पीड़िता की सहमति होती तो वह घटना के 6 घंटे के भीतर प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कराने पुलिस थाने नहीं जाती। फिरता शिक्षित ग्रामीण महिला थी उसके द्वारा रिपोर्ट दर्ज कराने में हुई देरी का भी उचित स्पष्टीकरण दिया गया है। आरोपी मंगल सिंह के खिलाफ बांदा के तिंदवारी थाना क्षेत्र में 28 मई 1986 को दुष्कर्म के आरोप में प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कराई गई थी। ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को दोषी करार देते हुए 7 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी।

Source: Newsline Features And Press Agency, Agra

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