
सरफेसी एक्ट की धारा-14 में कर्जदार को सुनवाई का अधिकार नहीं
इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति प्रकाश पाडिया और न्यायमूर्ति विवेक सरन की खंडपीठ ने सरफेसी एक्ट की धारा-14 के तहत बैंक की ओर से बंधक संपत्ति पर कब्जे की कार्रवाई से जुड़े मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धारा-14 के तहत कार्रवाई करते समय जिला मजिस्ट्रेट या मुख्य महानगर मजिस्ट्रेट का काम न्यायिक विवाद का फैसला करना नहीं, बल्कि बैंक के आवेदन में दी गई जानकारी और दस्तावेजों की वैधता की जांच कर आवश्यक आदेश पारित करना है।
मामले में कर्जदार की ओर से दलील दी गई थी कि संपत्ति पर कब्जे की कार्रवाई से पहले उसे सुनवाई का अवसर दिया जाना चाहिए। हालांकि हाईकोर्ट ने कहा कि सरफेसी एक्ट की धारा-14 के तहत मजिस्ट्रेट द्वारा की जाने वाली प्रक्रिया का उद्देश्य बैंक को बंधक संपत्ति का कब्जा दिलाने में सहायता करना है। न्यायालय ने यह भी माना कि कर्जदार के पास कानून के तहत अपनी आपत्तियां रखने के लिए वैकल्पिक कानूनी उपाय उपलब्ध हैं।
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हाईकोर्ट की इस टिप्पणी से बैंक और वित्तीय संस्थानों द्वारा ऋण वसूली की प्रक्रिया को लेकर महत्वपूर्ण कानूनी स्थिति सामने आई है। हालांकि, कर्जदार के अधिकार पूरी तरह समाप्त नहीं होते और सरफेसी एक्ट के तहत उपलब्ध वैधानिक उपायों के जरिए कार्रवाई को चुनौती दी जा सकती है। ऐसे में धारा-14 के तहत मजिस्ट्रेट की भूमिका मुख्य रूप से निर्धारित कानूनी प्रक्रिया और बैंक द्वारा प्रस्तुत दस्तावेजों की जांच तक सीमित मानी गई है।
Source: Newsline Features And Press Agency, Agra



