
बाल अपचारियों के सामाजिक जीवन को संवारने की जरूरत : हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस अजय भनोट की एकल पीठ ने कहा कि बचपन के गुनाहों की सबसे बड़ी सजा सामाजिक उपेक्षा है। बाल अपचारियों को सजा की नहीं, उनके उजड़े सामाजिक जीवन को सजाने संवारने की जरूरत है।
पीठ ने कहा कि किशोर न्याय अधिनियम का मकसद बच्चों को सजा देना नहीं, उन्हें सुधारना है। जमानत देने के बाद बच्चों के सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक, मानसिक, मनोवैज्ञानिक हालातों का अध्ययन कर उनकी शिक्षा, योग, खेल, संगीत, कला, शिल्प, कहानी कथन, जीवन कौशल और जरूरत के अनुसार काउंसलिंग करना किशोर न्याय बोर्ड और बाल न्यायालयों की सामाजिक जिम्मेदारी है।
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Source: Newsline Features And Press Agency, Agra



